महापौर ने पिछले दो साल में कई बार औचक छापा उन बस्तियाें पर मारा जहां पर कूड़ा बीनने वाले रहते हैं। कई बार अल्टीमेटम भी दिया कि 15 दिन और एक सप्ताह में बांग्लादेशी जगह छोड़कर चले जाएं। उसके बाद कागजी जांच भी हुई मगर अब तक एक भी बांग्लादेशी न तो पकड़ा गया और न ही बाहर किया गया और सब उसी तरह चल रहा है जेसे दो साल पहले चलता था।
नगर निगम की ओर से शहर में सफाई का काम निजी कंपनी और रामकी और लॉयन एनवायरो के अलावा करीब 30 कार्यदायी संस्थाएं भी कर रही हैं। इनके अलावा प्राइवेट लोग भी काम करते हैं। पिछले दो साल में महापौर की ओर से कई बार यह मुद्दा उठाया गया कि शहर में सफाई और कूड़ा उठान का काम बड़ी संख्या में बांग्लादेशी अवैध रूप से करते हैं। महापौर ने चार दिसंबर 2025 को शंकरपुरवा प्रथम वार्ड की बहादुर बस्ती में छापा भी मारा था। यहां पर बड़ी संख्या में कूड़ा बीनने वाले रहते मिले थे। उस दौरान महापौर वहां रहने वालों से उनकी पहचान का प्रमाण दिखाने को कहा था और मौके पर कई पहचान नहीं दिखा पाए थे।
इस कड़ी नाराजगी जताते हुए 15 दिन में प्रमाण दिखाने या बस्ती छोड़ने का अल्टीमेटम दिया था। इससे पहले 29 दिसंबर 2024 को इंदिरा नगर के चांदन गांव में बड़ा बवाल भी बांग्लादेशियों को लेकर हुआ था। जिसमें घरों से कूड़ा कलेक्शन करने वाले प्राइवेट ठेलिया वालों को नगर निगम की टीम की ओर से पकड़े जाने पर मारपीट हुई थी। नगर निगम के कई कर्मचारियेां को पीटे जाने का आरोप प्राइवेट ठेलिया वालों पर लगा था। मामले की जानकारी के बाद महापौर सुषमा खर्कवाल और तत्कालीन नगर आयुक्त इंद्रजीत सिंह और पुलिस अफसर मौके पर पहुंचे थे। मारपीट करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी और झोपड़ियों पर बुलडोजर भी चला था। घटना के बाद महापौर ने कहा था कि शहर से अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्या को चिन्हित कर बाहर किया जाएगा लेकिन ऐसा हुआ हुआ नहीं।
कागजी कार्यवाही हुई, मिला कोई नहीं
बांग्लादेशियों केा बाहर करने के लिए कई बार कागजी कवायद हो चुकी है। नगर निगम के नगर स्वास्थ्य अधिकारी पीके श्रीवास्तव की ओर से बांग्लादेशियों की जांच कर उन्हें चिहिन्त करने को लेकर कार्यवाही शुरू की गई। उनकी ओर से सभी जोनल सिनेटरी अधिकारियों को आदेश जारी किए। जिसमें कहा गया है कि कार्यदायी संस्थाओं के जरिए तैनात सभी सफाई कर्मियों का पुलिस से सत्यापन कराए जाने को कहा गया। इसके अलावा महापौर की ओर से डीएम और पुलिस आयुक्त को भी इस संबंध में पत्र लिखे गए मगर हुआ कुछ नहीं। यह जरूर है कि इस विवाद के बीच रामकी कंपनी के करीब 120 कर्मचारी बिना सूचना के ही नौकरी छोड़कर चले गए। यह कौन थे, इसका खुलासा नहीं किया गया।
…यह भी चर्चा
इतनी कवायद होने के बाद भी कोई बांग्लादेशी नहीं पकड़ा गया जबकि चर्चा हर कोई यही करता है कि ज्यादातर बांग्लादेशी ही कूड़े का काम करते हैं। इसको लेकर जानकारों का कहना है कि विवाद के बाद वही हुआ जो होता है। शहर में जो बाहर से सफाई करने वाले कर्मचारियों को लाते हैं उन्होंने ऐसी सेटिंग बैठा ली है कि अब कोई बांग्लादेशी नहीं नहीं रहा। आसाम से मजदूर लाने वाले शहर में करीब आधा दर्जन बड़े ठेकेदार हैं। वहीं उनको बसाते हैं और काम कराते हैं।