पत्रकार अली हैदर अवध न्यूज नेटवर्क. लखनऊ। लखनऊ जिसे अदब और तहजीब का शहर कहा जाता है, आजकल एक नए हुनर के लिए चर्चा में है। इसे आप तहजीब तो नहीं कह सकते, लेकिन जमीन-जीब जमीन हड़पने का हुनर कहना गलत नहीं होगा। वज़ीर बाग के इलाके में एक ऐसा जादूई शो चल रहा है जिसे देखकर डेवि़ड कॉपरफील्ड भी अपना सिर पीट लें। यहाँ नवाबों के वारिसों की जमीन कागजों पर गायब होती है और रातों-रात किसी सहकारी समिति की जागीर बन जाती है।बात हो रही है गाटा संख्या 559, 560, 561 और 565 की, ये वो जमीनें हैं जिनका इतिहास नवाब मिर्ज़ा खुर्रम बक़त की शान से जुड़ा है। लेकिन साहब, इतिहास की क्या औकात? यहाँ तो वर्तमान के विकास पुरुष काम करते हैं। यहाँ का जादुई फॉर्मूला बड़ा सीधा है, पुराने कागज उठाओ, वारिसों को भूलो, और किसी राज सहकारी समिति का बोर्ड टांग दो। बस, फिर क्या था? नवाब की जमीन सीधे समिति की झोली में!इस पूरे खेल के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के रूप में बेचु लाल, रमेश, शंकर, सतीश और भोला जैसे विजनरी लोग सामने आते हैं। इन लोगों की मेहनत को सलाम करना चाहिए। देखिए, कैसे भोला नर्सरी के आगे की जमीन को प्लाटिंग में बदल दिया गया। ये कोई साधारण प्लाटिंग नहीं है, ये अदृश्य अधिकारों का खेल है। अब ये लोग पीछे की जमीन को भी बेचने की तैयारी में हैं। लगता है, लखनऊ की मिट्टी में अब नवाबों की तहजीब नहीं, बल्कि जमीन बेचने की स्पीड पकड़ी जाती है।आसिफ और नासिर की जोड़ी तो जैसे इस फिल्म के स्टंटमैन हैं। भोला अग्नि जैसे किरदारों के साथ मिलकर यह गैंग जिस तरह पुरानी फाइलों में हेरफेर कर रहा है, वो किसी बड़ी ओटीटी (OTT) क्राइम वेब सीरीज से कम नहीं है। फर्क बस इतना है कि इसमें पीड़ित असली हैं और गुंडे सफेदपोश।अब सवाल ये उठता है कि प्रशासन कहाँ है? क्या उन्हें गाटा संख्या के इन आंकड़ों में कुछ गड़बड़ नहीं दिखती? या फिर उनकी आंखों पर विकास की पट्टी इतनी कसकर बंधी है कि उन्हें केवल प्लाटों की बाउंड्री ही दिखाई देती है? बेचारे वारिस दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, अपने पुश्तैनी कागज हाथ में लिए खड़े हैं, लेकिन सिस्टम के गलियारों में उनकी आवाज़ किसी दबी हुई फुसफुसाहट से ज्यादा कुछ नहीं है।लखनऊ के वज़ीर बाग में जो हो रहा है, वो सिर्फ एक जमीन का सौदा नहीं है, बल्कि भरोसे और कानून की नीलामी है। यदि सरकारी समितियाँ इस तरह से किसी की भी जमीन को अपना बनाने लगेंगी, तो फिर अदालत और कागजों की क्या जरूरत? अगली बार जब आप वज़ीर बाग से गुजरें, तो जरा गौर से देखिएगा, कहीं वहां भी कोई जादू तो नहीं हो रहा?शायद अगली बार, कोई और सहकारी समिति आकर कहे कि यह शहर भी अब हमारा है। क्योंकि जब कानून सो रहा हो, तो विकास तो होगा ही, जमीन का, बेईमानों का!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *