CJP कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रंका को दिल्ली हाईकोर्ट से तत्काल राहत मिलने की उम्मीद को झटका लगा है. दोनों की न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और शांति व्यवस्था से जुड़े कई सवाल उठाए. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों कार्यकर्ताओं के वकील को याचिका वापस लेकर एसईएम (कार्यकारी मजिस्ट्रेट) की अदालत में होने वाली सुनवाई का इंतजार करने का सुझाव दिया. इसके बाद दोनों के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया.

इस मामले में CJP की लीगल हेड रत्ना सिंह ने पहले सोशल मीडिया पर जानकारी दी थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार कर ली है. उन्होंने दोनों की गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए हाईकोर्ट से इसे खत्म करने की अपील की थी.

हाईकोर्ट ने कहा- आपने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने सौरव दास और आशुतोष रंका की ओर से दायर याचिका पर बॉन्ड की शर्तों को लेकर सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने बॉन्ड का उल्लंघन किया है. कोर्ट ने पूछा कि क्या बॉन्ड की शर्तों पर जोर देना इतना गैरकानूनी हो सकता है?

अदालत ने यह भी कहा कि डीनोटिफिकेशन के बाद दोनों जंतर-मंतर गए थे. कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि डीनोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और उस पर कोई रोक नहीं लगी है. अदालत ने सवाल उठाया कि यदि दूसरी बार बॉन्ड का उल्लंघन हुआ है, तो क्या अधिकारियों को सख्त शर्तें लगाने का अधिकार नहीं है?

बैरिकेड तोड़ने और शांति व्यवस्था को लेकर भी सवाल

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता प्रदर्शन में सबसे आगे रहते हैं. ऐसे में जब वे बैरिकेड तोड़ते हैं, तो बड़ी संख्या में दूसरे लोगों के भी ऐसा करने की आशंका रहती है. अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शन में कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं, जो याचिकाकर्ताओं के नियंत्रण में न हों. कोर्ट ने इस संदर्भ में देश के बाहर हुई घटनाओं का भी जिक्र किया. अदालत की टिप्पणियों से साफ हुआ कि सुनवाई के दौरान केवल बॉन्ड की शर्तों ही नहीं, बल्कि प्रदर्शन के दौरान शांति व्यवस्था बिगड़ने की आशंका और आयोजकों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए.

कोर्ट ने पूछा- संगठन कौन सा है और उसका मकसद क्या है?

सुनवाई के दौरान अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रंका की उम्र के बारे में भी पूछा. दोनों की उम्र जानने के बाद कोर्ट ने टिप्पणी की कि वे जेन-जी नहीं हैं. अदालत ने यह भी पूछा कि मिलेनियल्स किस उम्र के लोगों को कहा जाता है. इसके बाद हाईकोर्ट ने प्रदर्शन के स्वरूप और उसके उद्देश्य को लेकर सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि जुलाई में हुआ प्रदर्शन पहले छात्रों का प्रदर्शन था, जिसमें बच्चे भी शामिल थे, लेकिन अब प्रदर्शन का मुद्दा बदल गया है. कोर्ट के मुताबिक, लोग और संगठन वही हैं, लेकिन प्रदर्शन का मकसद बदल गया है. अदालत ने पूछा कि याचिकाकर्ता कौन हैं, किस संगठन से जुड़े हैं और उस संगठन का उद्देश्य क्या है? कोर्ट ने कहा कि जब शांति भंग होने की आशंका हो, तब इन सवालों के जवाब जानना जरूरी हो जाता है.

अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन करने वाले संगठनों को लेकर टिप्पणी

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि यदि कोई संगठन समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों और उद्देश्यों को लेकर लोगों को जुटाता है, तो क्या शांति भंग होने की आशंका पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को इन पहलुओं को ध्यान में नहीं रखना चाहिए?

वकील ने वापस ली याचिका, अब एसईएम कोर्ट की सुनवाई पर नजर

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सौरव दास और आशुतोष रंका के वकील को सुझाव दिया कि वे याचिका वापस लेकर उसी दिन एसईएम अदालत में होने वाली सुनवाई का इंतजार कर सकते हैं. इसके बाद दोनों कार्यकर्ताओं के वकील ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी. हाईकोर्ट ने याचिका वापस लेने की इजाजत दे दी. इससे इस याचिका पर हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही समाप्त हो गई. अब दोनों कार्यकर्ताओं को एसईएम अदालत में पेश किए जाने और वहां होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी.

रत्ना सिंह ने जताई थी गिरफ्तारी खत्म होने की उम्मीद

इससे पहले CJP की लीगल हेड रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया पर बताया था कि सौरव दास और आशुतोष रंका की न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए अदालत से अनुरोध किया गया था. हाईकोर्ट ने इसे उसी दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अनुमति दी थी. रत्ना सिंह ने यह भी बताया था कि दोनों की हिरासत की अवधि उसी दिन समाप्त हो रही है और उन्हें एसईएम अदालत में पेश किया जाना है. उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट से कथित अवैध गिरफ्तारी खत्म करने की अपील की थी.

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